तांबेश्वर मंदिर में क्यों बिसराए गए कायाकल्प के नायक ? रसूख की जंग में आस्था का अपमान…

फोटो- उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन, पूर्व में फतेहपुर के डीएम रहे (मौजूदा समय में कमिश्नर) आंजनेय कुमार सिंह, दादा उदय मान सिंह व स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती (सभी की फ़ाइल फोटो)
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     विशेष अन्वेषणः रसूख की जंग में आस्था का अपमान….
   तांबेश्वर मंदिर में क्यों बिसराए गए कायाकल्प के नायक?
 
एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज़  फतेहपुर– जनपद के दो पौराणिक देवालय-बांके बिहारी और सिद्ध पीठ तांबेश्वर महादेव हैं। एक शहर की आत्मा हैं, तो दूसरा लाख़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र। इन दोनों ही मंदिरों की भव्यता को निखारने में प्रदेश के दो कद्दावर आईएएस अधिकारियों ने न केवल अपना पसीना बहाया, बल्कि आज भी पद की गरिमा से ऊपर उठकर इनके संरक्षण की मानसिक फ़िक्र रखते हैं, लेकिन विडंबना देखिए कि जहाँ एक जगह योगदान को शिलाओं पर उकेरा गया, वहीं दूसरी जगह उसे साजिश की धूल में दबा दिया गया है।
दो अधिकारी, दो मंदिर और दो अलग तस्वीरें- जनता के बीच बनी चर्चा का विषयः उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन और पूर्व जिलाधिकारी आँजनेय कुमार सिंह ने फतेहपुर के इन मंदिरों के कायाकल्प को अपना मिशन बनाया था। बांके बिहारी मंदिर की दीवारों पर आँजनेय कुमार सिंह और उनके परिजनों का नाम आज भी उनके योगदान की गवाही दे रहा है। वहीं दूसरी ओर आलोक रंजन और उनके ससुर उदयमान सिंह ने तांबेश्वर मंदिर के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया, लेकिन उनका शिलापट्ट भी दीवार में सजाने की जगह धूल खाना के हवाले कर दी गई। चर्चा है कि ये अधिकारी आज भी इन मंदिरों की स्थिति को लेकर चिंतित रहते हैं, लेकिन तांबेश्वर मंदिर का मौजूदा तंत्र उनकी इस फ़िक्र और समर्पण का अपमान करने पर उतारू है।
वयोवृद्ध उदयमान सिंह का भगीरथ प्रयास और ट्रस्ट की बेरुखी- तांबेश्वर मंदिर के कायाकल्प की कहानी दादा उदयमान सिंह के जिक्र के बिना अधूरी है। अपनी बुज़ुर्गी और गिरते स्वास्थ्य को दरकिनार कर उन्होंने वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर मंदिर के जीर्णोद्धार की निगरानी की। उनके साथ स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती का आध्यात्मिक ओज और आलोक रंजन का प्रशासनिक सहयोग जुड़ा था। आरोप है कि आज उसी मंदिर परिसर में इन नामों को लेने वाला कोई नहीं है। आलोक रंजन के नाम का शिलापट्ट पिछले पांच वर्षों से उपेक्षित पड़ा है, जिसे लगवाने के लिए मौजूदा ट्रस्ट तनिक भी तैयार नहीं दिखता। यह सवाल आज हर श्रद्धालु की जुबान पर है कि आखिर इन नायकों से ट्रस्ट को इतनी चिढ़ क्यों है?
कार्यवाहकों के जाल में फंसा मंदिरः कौन है असली कर्ता-धर्ता?- मंदिर की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए अधिवक्ता अभिषेक सिंह ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में आरोप लगाया है कि ट्रस्ट फिलहाल पूरी तरह कार्यवाहकों के भरोसे है। भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष मुखलाल पाल स्वयं को कार्यवाहक अध्यक्ष बताते हैं। ओम प्रकाश रस्तोगी के निधन के बाद उनके पुत्र अनिल रस्तोगी ने खुद को सचिव घोषित किया और उनके अस्वस्थ होने पर छोटे भाई दीपक रस्तोगी ने बागडोर संभाली। इसी तरह कृष्णशरण लाल श्रीवास्तव के निधन के बाद उनके पुत्र सुधांशु श्रीवास्तव कार्यवाहक प्रबंधक बन गए। आरोप है कि इनमें से किसी की भी नियुक्ति नियमानुसार नहीं है, जिसके कारण ट्रस्ट में अराजकता का माहौल है।
बैंक खातों का रहस्य- लाखों रुपये जाम, फिर भी खर्च बेलगाम?- शिकायती पत्र के अनुसार, मंदिर ट्रस्ट के अलग-अलग बैंक खातों का संचालन पूरी तरह पटरी से उतर चुका है। इन खातों के तथाकथित संचालकों की सूची और विवाद इस प्रकार हैं- ओम प्रकाश रस्तोगी – कृष्णशरण लाल श्रीवास्तव, कृष्णशरण लाल श्रीवास्तव – अनिल रस्तोगी, राधेश्याम गुप्ता – राजीव अग्रवाल, सुधांशु श्रीवास्तव – दीपक रस्तोगी। आरोप है कि इन संचालकों की मृत्यु या तकनीकी कारणों से बैंक खाते पिछले लगभग चार वर्षों से सुचारू रुप से संचालित नहीं हो रहे हैं। इन खातों में लाखों की धनराशि लॉक है।
यक्ष प्रश्न- आखिर कहाँ जा रहा है दानपात्र का लाखों रुपया?- जब बैंक खाते बंद हैं तो मंदिर के दान पात्रों से हर महीने निकलने वाली लाखों की नकदी कहाँ जा रही है? शिकायती पत्र में एक सनसनीखेज उल्लेख भिटौरा में खरीदी गई 50 लाख की जमीन का है। आरोप है कि यह संपत्ति मंदिर के धन से अर्जित की गई है। साथ ही पूर्व ट्रस्टी के नाम वाली एफडीआर की वसूली को लेकर भी क्या वयोवृद्ध भाजपा नेता और ट्रस्ट अध्यक्ष राधेश्याम गुप्ता तथा उनके विधायक पुत्र विकास गुप्ता इस वित्तीय अनियमितता की जांच कराएंगे? या सत्ता के प्रभाव में इन गंभीर आरोपों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
क्या प्रशासन मौन रहेगा?- अधिवक्ता अभिषेक सिंह की शिकायत के बाद सवाल जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे हैं। डीएम स्तर पर हुईं कई शिकायतों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होना, सत्ता पक्ष के दबाव की पुष्टि तो करता ही है। साथ ही प्रशासन की भूमिका को भी कठघरे में खड़ा करता है।
एक ओर वे अधिकारी हैं जो आज भी इन मंदिरों की भव्यता की चिंता करते हैं, और दूसरी ओर वह सिस्टम है जो अपनों को उपकृत करने और दानपात्र की आय पर कुंडली मारकर बैठने में व्यस्त है। तांबेश्वर मंदिर का यह विवाद अब लखनऊ के गलियारों तक पहुँच चुका है, देखना होगा कि बाबा तांबेश्वर के दरबार में न्याय की जीत होती है या परिवारवाद की!

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