धान खरीद में ‘कागजी जादूगरी’, अन्नदाता की मेहनत पर भारी मिलर और केंद्र प्रभारियों की जुगलबंदी
एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज़ फतेहपुर — जनपद में धान खरीद की आड़ में भ्रष्टाचार का एक ऐसा खेल सामने आया है जिसने व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कार्यवाहक डिप्टी आरएमओ समीर कुमार शुक्ला के कार्यकाल में खरीद के ऐसे नए-नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जिससे जिले का किसान खुद को ठगा महसूस कर रहा है। चर्चा है कि मिलरों और केंद्र प्रभारियों की मिलीभगत से ‘बिहारी चावल’ के दम पर धान की कागजी खरीद का खेल बदस्तूर जारी है और जिम्मेदार अधिकारी इससे पूरी तरह बेखबर बने हुए हैं।
आंकड़ों का अजूबा: 21 केंद्रों पर एक जैसी खरीद: बीते 26 फरवरी 2026 की खरीद के सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो भ्रष्टाचार की परतें साफ नजर आती हैं। जिले के विपणन शाखा के कोड़ा जहानाबाद, थरियांव, हसवा, किशनपुर, धाता, हथगाम, बहुआ और मलवा जैसे क्षेत्रों में जहां धान की वास्तविक पैदावार जगजाहिर है, वहां कागजी आंकड़ों ने सबको चौंका दिया है।
प्रादेशिक को-ऑपरेटिव फेडरेशन (पीसीएफ) के कांटों के लिए यह दिन सबसे ‘शुभ’ रहा। जनपद के अन्दौली, हसवा, बकन्धा, तेलियानी, बरारी, भिटौरा, देवरी, लक्ष्मणपुर, गाजीपुर, बहुआ, हुसैनगंज, जमरावा, कारीकान, खजुआ, महरहा, मेवली, पधारा, देवमई, सातों जोगा, सीतापुर, और मुरांव सहित लगभग 21 खरीद केंद्रों पर आश्चर्यजनक रूप से ठीक 50-50 कुंतल की खरीद दिखाई गई है।
भारतीय खाद्य निगम और यूपीएसएस में भी ‘समानता’ का खेल: हैरानी की बात यह है कि भारतीय खाद्य निगम (एफ़सीआई) कोड़ा जहानाबाद और भारतीय खाद्य निगम फतेहपुर नगर पालिका परिषद में भी ठीक 100-100 कुंतल की ही खरीद दर्ज की गई है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश उपभोक्ता सहकारी संघ (यूपीएसएस) खागा नगर पंचायत में भी कागजों पर 100 कुंतल की खरीद दिखाई गई है। जानकारों का कहना है कि हर केंद्र पर एक समान आंकड़ा होना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि यह खरीद वास्तविक नहीं, बल्कि केवल फाइलों को भरने के लिए की गई ‘जुगलबंदी’ है।
केंद्रों से धान नदारद, रिसीटे से भरा जा रहा पेट: धरातल पर हकीकत यह है कि इन केंद्रों पर धान का कहीं पता नहीं है। आरोप है कि व्यापारी और बिचौलिए मिलरों से रिसीटे प्राप्त कर सीधे केंद्रों पर चढ़ा रहे हैं। इस तरह बिना एक भी दाना खरीदे कागजों में खरीद की जा रही है। मिलर और केंद्र प्रभारियों का यह गठजोड़ शासन की मंशा पर पानी फेर रहा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या उच्चाधिकारी इस ‘कागजी लूट’ की जांच कराएंगे या अन्नदाता यूं ही लूटता रहेगा?
