कानून या आदेश? प्रेस की स्वतंत्रता पर उठे सवाल
दीपक धुरिया अजरा न्यूज़ जालौन– हाल ही में यूपी पुलिस की एक डीएसपी, सौम्या अस्थाना के कथित बयान को लेकर बहस छिड़ गई है। दावा किया जा रहा है कि उन्होंने निर्देश दिया है— “मेरे किसी भी थाने में अगर पत्रकार ने वीडियोग्राफी की तो तत्काल मुकदमा दर्ज किया जाएगा।”
यह कथित आदेश सामने आने के बाद कई कानूनी और संवैधानिक प्रश्न उठ खड़े हुए हैं।
क्या कहता है संविधान?
भारत के संविधान का अनुच्छेद 19( 1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यही प्रावधान प्रेस की स्वतंत्रता का आधार माना जाता है।
पत्रकार सार्वजनिक हित में सूचना संकलन और रिपोर्टिंग का कार्य करते हैं। थाना एक सरकारी कार्यालय है, निजी परिसर नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल मौखिक आदेश के आधार पर रिपोर्टिंग या वीडियोग्राफी पर पूर्ण रोक लगाई जा सकती है?
न्यायालयों की दृष्टि
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने अपने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक तभी लगाई जा सकती है, जब उसके पीछे स्पष्ट और वैध कानूनी आधार हो।
कानून में परिभाषित अपराध के बिना केवल “आदेश” के आधार पर एफआईआर दर्ज करना मनमानी की श्रेणी में आ सकता है।
बहस का मूल प्रश्न
मुद्दा सिर्फ पत्रकारों का नहीं है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों का है। यदि आज कैमरे पर रोक लगेगी, तो कल अभिव्यक्ति पर भी प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
कानून का शासन व्यक्तिगत आदेशों से नहीं, बल्कि संविधान और विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से चलता है। वर्दी और पद का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन कानून से ऊपर कोई नहीं।
अंततः यह विषय निष्पक्ष कानूनी परीक्षण और स्पष्ट दिशा-निर्देशों की मांग करता है, ताकि प्रेस की स्वतंत्रता और प्रशासनिक गरिमा— दोनों सुरक्षित रह