जालौन के केवटरा स्थित खंड संख्या-2 में लगातार दौड़ रही ओवरलोड गाड़ियां— मौरंग माफिया ने NGT के नियमों की उड़ाई धज्जियां, कानून व्यवस्था को खुली चुनौती!
दीपक धुरिया अजरा न्यूज़ जालौन – कहटा और केवटरा क्षेत्र में इन दिनों मौरंग माफिया का दबदबा इतना बढ़ चुका है कि नदियों की सुरक्षा, पर्यावरण के नियम और NGT के आदेश सब बेअसर होते दिखाई दे रहे हैं। केवटरा खंड संख्या-2 में लगातार ओवरलोड गाड़ियों का आना-जाना इस कदर बढ़ गया है कि रातभर नदी का पूरा इलाका मिनी-हाईवे की तरह गूंजता रहता है। भारी-भरकम ट्रैक्टर-ट्रॉलियां, कई-कई टन रेत लादे, घाटों से तेज़ी से निकलती हैं और सड़कें उनके वजन से टूटती जा रही हैं। स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि घाटों पर रात होते ही पोकलैंड जैसी प्रतिबंधित मशीनें सक्रिय हो जाती हैं, जबकि NGT ने नदी के भीतर किसी भी प्रकार की मैकेनिकल माइनिंग पर सख्त रोक लगा रखी है। आदेशों में साफ कहा गया है कि नदियों के सक्रिय बहाव क्षेत्र में मशीन से खुदाई, बड़े उपकरणों का उपयोग, रात में खनन और ओवरलोड परिवहन—सब पूरी तरह गैरकानूनी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट दिखाई देती है।
नियमों की धज्जियां उड़ाने का आलम यह है कि जहां NGT ने पर्यावरणीय मंजूरी, जिला सर्वे रिपोर्ट (DSR) और वैज्ञानिक खनन पद्धति को अनिवार्य किया है, वहीं मौरंग माफिया बिना किसी अनुमति, बिना किसी सुरक्षा मानक और बिना किसी निगरानी के, नदी की रेत को मिनटों में साफ कर दे रहे हैं। घाटों पर मशीनों की आवाज को दबाने के लिए रात के समय खनन किया जाता है और वाहनों को जंगल व कच्चे रास्तों से निकाला जाता है ताकि कोई कार्रवाई न हो सके। यही कारण है कि सुबह होते-होते नदी के कटाव, गहरे गड्ढे और उखड़ी हुई रेत यह बताने के लिए काफी होते हैं कि रातभर क्या हुआ है।
स्थानीय लोगों का दावा है कि यह सब कुछ प्रशासनिक ढिलाई और विभागीय मिलीभगत के बिना संभव ही नहीं है। खनन विभाग से लेकर राजस्व तंत्र तक, कोई भी वास्तविकता को न तो रोक रहा है और न ही स्वीकार कर रहा है। रिपोर्टों में “सब सामान्य” लिखा जाता है, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि नदी का पूरा भू-भाग बुरी तरह तबाह हो रहा है। अवैध खनन से पर्यावरण, भू-जल स्तर, नदी की प्राकृतिक धारा, यहां तक कि ग्रामीणों की खेती और जीवन तक खतरे में पड़ गया है।
स्थिति इतनी भयावह है कि मौरंग माफिया अब कानून से नहीं डरते, बल्कि कानून को चुनौती देने की हिम्मत करने लगे हैं। प्रशासन की खामोशी और कार्रवाई का अभाव उनके हौसलों को और बुलंद कर रहा है। यह सिर्फ अवैध खनन का मामला नहीं, बल्कि NGT के आदेशों, पर्यावरणीय नियमों और सरकारी व्यवस्था की साख को खुलेआम चट्टानों की तरह कुचलने जैसा अपराध है—और इसका भुगतान आने वाली पीढ़ियों को करना पड़ेगा।

