विशेष रिपोर्ट- सहकारिता विभाग में वसूली बाबू का समानांतर तंत्र
– एआरसीएस कार्यालय बना अनिल वर्मा की निजी जागीर, दागी सचिवों को संरक्षण देने के लिए बिछने लगा जाल
– बांदा में भ्रष्टाचार पर नकेल कसने वाले अंसल कुमार के लिए फतेहपुर का काकस बन सकता है चुनौती
– फाइलों की हेराफेरी में माहिर है सिंडिकेट
– रसूख के चलते कराई बेटे की कराई पोस्टिंग, वेतन फसा…
एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज़ फतेहपुर– जिले के सहकारिता विभाग में इन दिनों एक ही चर्चा आम है- साहब नए हैं, लेकिन सिस्टम पुराना है। बांदा के तेज-तर्रार अधिकारी अंसल कुमार ने अभी कार्यभार संभाला ही है कि विभाग के स्वयंभू रणनीतिकारों ने उन्हें अपनी फाइलों के मायाजाल में उलझाना शुरू कर दिया है। इस घेराबंदी का नेतृत्व कोई बड़ा अधिकारी नहीं, बल्कि संग्रह सहायक अनिल वर्मा कर रहा है, जिसकी तूती विभाग के गलियारों में अफसरों से ज्यादा बोलती है।
पटल वसूली का, रसूख सुपर एआरसीएस का- नियमतः अनिल वर्मा का काम बकाया वसूली में तेजी लाना है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। चर्चा है कि वर्मा ने कार्यालय के भीतर एक समानांतर सत्ता स्थापित कर ली है। महत्वपूर्ण पटल और गोपनीय फाइलों तक उसकी अनधिकृत पहुंच ने पारदर्शी व्यवस्था को मजाक बना दिया है। सूत्रों का दावा है कि ऑडिट से लेकर धान खरीद केन्द्रों के आवंटन तक, हर फाइल पहले वर्मा फिल्टर से होकर गुजरती है। जो सचिव इस काकस की सेवा में रहते हैं, उनके दाग धो दिए जाते हैं और जो आंख दिखाते हैं, उनके खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा तैयार कर दिया जाता है।
धान खरीदः गबन के खिलाड़ियों को अभयदान- पिछले सत्रों में धान खरीद के दौरान करोड़ों के हेरफेर और फर्जीवाड़े की जो शिकायतें आई थीं, उनमें से अधिकांश को इसी काकस ने ठंडे बस्ते में डलवा दिया। अनिल वर्मा पर आरोप है कि वह दागी सचिवों और बिचौलियों के बीच एक मजबूत कड़ी का काम करता है। जब भी जांच की आंच बड़े चेहरों तक पहुँचती है, तो यह सिंडिकेट यूनियन की आड़ लेकर या उच्चाधिकारियों को गुमराह कर जांच की दिशा मुड़वा देता है।
कड़वा सच- संग्रह सहायक अनिल वर्मा की संपत्ति और उसके कार्यक्षेत्र से बाहर के हस्तक्षेप की अगर उच्चस्तरीय जांच हो, तो सहकारिता के कई बड़े सफेदपोश बेनकाब हो सकते हैं।
अंसल कुमार के हंटर पर टिकी निगाहें- अंसल कुमार अपनी कार्यकुशलता और सख्त मिजाज के लिए जाने जाते हैं। फतेहपुर में बेपटरी हो चुकी सहकारिता व्यवस्था को उनके जैसे ही इलाज की जरूरत है। स्थानीय जागरूक लोगों का कहना है कि अगर अंसल कुमार ने इस वर्मा सिंडिकेट की जड़ें काट दीं, तो किसानों को उनका हक मिलने लगेगा। लेकिन सवाल वही है- क्या नया अधिकारी इस पुराने और शातिर काकस के चक्रव्यूह को तोड़ पाएगा या फिर अनिल वर्मा अपनी पुरानी आदतों के अनुसार व्यवस्था को बंधक बनाए रखेगा?
सावधान! सक्रिय है शिकायती गैंग- जैसे ही अंसल कुमार ने पदभार लिया, विभाग में फर्जी शिकायती पत्र टाइप करने वाली मशीनें भी सक्रिय हो गई हैं। यह इस काकस का पुराना हथियार है- अधिकारी को इतना डराओ या उलझाओ कि वह काम ही न कर सके। लेकिन बांदा में अंसल कुमार का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि वे ऐसे गीदड़ भभकियों से डरने वाले नहीं हैं।
रसूख़ के चलते करा दी बेटे की पोस्टिंग, फस गया वेतन- अनिल वर्मा के हाइप्रोफाइल रसूख़ का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने हसवा ब्लॉक क्षेत्र की एक बी-पैक्स से अपने बेटे उज्ज्वल सिंह वर्मा की पोस्टिंग में तत्कालीन एआरसीएस मोहसिन ज़मील पर इतना दबाव बना दिया कि उन्होंने नियमों से इतर जाकर उसकी पोस्टिंग बी-पैक्स जोनिहा में करके अपनी कलम फ़सा दी, एक शिकायत में उज्ज्वल की पोस्टिंग पर कई गंभीर सवाल उठाये गए हैं। ख़बर है कि अब डीसीबी की संबंधित शाख़ा ने उज्जवल का वेतन निकालने से मना कर दिया है, क्योंकि ओपीडी में गड़बड़ी मिली है…!
