ताम्बेश्वर स्कैम’,,भिटौरा में खरीदी ज़मीन; क्या डीएम के आदेश पर भारी पड़ेगा रसूखदारों का ‘सिंडिकेट’?

      फतेहपुर का ‘ताम्बेश्वर स्कैम’: सवा करोड़ की एफडीआर पर ‘मौन’ और भिटौरा में खरीदी ज़मीन; क्या डीएम के आदेश पर भारी पड़ेगा रसूखदारों का ‘सिंडिकेट’?

एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज़ — फतेहपुर। जनपद के ऐतिहासिक ताम्बेश्वर मंदिर की अरबों की संपत्तियों पर कब्जे और वित्तीय बंदरबांट का जो अध्याय वर्षों से बंद था, उसकी परतें अब जिलाधिकारी रविंद्र सिंह के एक आदेश से खुलने लगी हैं। साकेत बिहारी के शिकायती पत्र पर डीएम के राजस्व टीम गठित कर सीमांकन के आदेश ने जिले के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। हालांकि, सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या सत्ता की धमक और तथाकथित ट्रस्ट में बैठे रसूखदारों की घेराबंदी इस प्रशासनिक आदेश को जमीन पर उतरने देगी?

सिस्टम की ‘लाचारी’ या रसूख का ‘खेल’?

यह तथ्य व्यवस्था की साख पर सवाल खड़ा करता है कि आखिर क्यों एसडीएम न्यायिक का आदेश लगभग एक साल तक फाइलों में दबा रहा? स्पष्ट है कि रसूखदारों के प्रभाव के चलते पूर्व में शिकायतों को ठंडे बस्ते में डाला गया। यदि शासन-प्रशासन ने समय रहते कदम उठाए होते तो आज मंदिर की सुरक्षित भूमियों पर कंक्रीट का साम्राज्य खड़ा नहीं होता। अब साक्ष्यों के दबाव में प्रशासन को इस कार्यवाही के लिए विवश होना पड़ा है।

वित्तीय अनियमितता:
सवा करोड़ की एफडीआर और भिटौरा की ‘खरीदी गई ज़मीन’ का मामला भी उभर कर जन चर्चा का विषय बनता जा रहा है। जांच का दायरा बढ़ने के साथ ही मंदिर प्रबंधन की वे गहरी विसंगतियां भी अब सार्वजनिक हो रही हैं जिन्हें अब तक रसूख के बल पर दबाकर रखा गया था।

एफडीआर का रहस्य:
आरोप है कि तथाकथित ट्रस्ट के तत्कालीन सचिव ओम प्रकाश रस्तोगी ने मंदिर के धन से अपने निजी नाम पर एफडीआर बनवाई थी जो अब ब्याज सहित करीब सवा करोड़ रुपये हो चुकी है। ट्रस्ट के मौजूदा कर्ता-धर्ता इस विशाल धनराशि की रिकवरी पर आखिर रहस्यमयी चुप्पी क्यों साधे हैं? इसको लेकर श्रृद्धालुओं में तरह-तरह की चर्चाएं हवा में तैरती नजर आती हैं।

मंदिर के पैसे से ‘निजी’ निवेश:
ये चर्चा आम है कि तथाकथित ट्रस्ट के ही एक कार्यवाहक पदाधिकारी ने मंदिर के कोष का कथित दुरुपयोग कर पिछले साल भिटौरा में कीमती ज़मीन खरीदी। इस संपत्ति की उच्चस्तरीय जांच अब समय की मांग है।

गाटा नंबरों का मायाजाल: तालाब की ज़मीन पर अवैध कब्ज़ेदारों की ऐश रंग बदल रही है। शिकायती पत्र के साक्ष्यों के अनुसार, तालाब की सुरक्षित भूमि पर अवैध निर्माण का खेल इन गाटा नंबरों पर खेला गया।
तालाबी गाटा संख्या: 298/1 (0.1210 हे.), 298/5 (0.8670 हे.) व 298/6 (0.2270 हे.)।

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ऊसर भूमि:
खाता संख्या 157 (पुराना नंबर 559)। इन नंबरों पर बिना किसी स्वीकृत नक्शे या बैनामे के आलीशान इमारतें खड़ी कर दी गई हैं, जिन्हें चिन्हित कर अब पत्थरगड़ी कराने के निर्देश दिए गए हैं।

खाते सीज, फिर कहाँ जा रहे हैं दान के ‘लाखों’?

तकनीकी कारणों से मंदिर के बैंक खाते वर्षों से फ्रीज हैं, लेकिन दान-पात्र से हर माह निकलने वाले लाखों रुपये का नकद प्रबंधन कौन कर रहा है? ट्रस्ट की इस अपारदर्शी कार्यप्रणाली ने न केवल मंदिर की व्यवस्थाओं को प्रभावित किया है, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था को भी ठेस पहुँचाई है।

ताम्बेश्वर मंदिर का यह प्रकरण अब महज अतिक्रमण का नहीं, बल्कि सफेदपोशों के संगठित भ्रष्टाचार का जीवंत उदाहरण है, जिस ट्रस्ट में सत्ता से जुड़े रसूखदारों का बोलबाला हो, वहां कानून का राज स्थापित करना जिलाधिकारी के लिए कड़ी चुनौती है। सवा करोड़ की एफडीआर और मंदिर के धन से निजी संपत्तियों की खरीद-फरोख्त जैसे आरोप सीधे तौर पर ‘आपराधिक’ श्रेणी में आते हैं। यदि इस बार भी कार्रवाई रसूख की भेंट चढ़ गई, तो यह फतेहपुर प्रशासन की साख पर कभी न मिटने वाला कलंक होगा। देखना यह है कि डीएम का आदेश इन ‘प्रभावशाली’ चेहरों के सिंडिकेट को तोड़ पाता है या नहीं।

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