भाजपा के टिकट वितरण, क्षेत्रीय जातीय संतुलन और आंतरिक ग्राउंड रिपोर्ट पर टिकीं नजरें
भाजपा के टिकट वितरण, क्षेत्रीय जातीय संतुलन और आंतरिक ग्राउंड रिपोर्ट पर टिकीं नजरें
हुसैनगंज में बसपा की बड़ी घेराबंदी: ‘लाला सिंह’ के नाम पर दांव, आंतरिक सर्वे में खुला सियासी समीकरण
नब्बे के दशक का अधूरा अध्याय दोबारा लिखने की तैयारी में बसपा हाईकमान
भाजपा के टिकट वितरण, क्षेत्रीय जातीय संतुलन और आंतरिक ग्राउंड रिपोर्ट पर टिकीं नजरें
अज़रा न्यूजफतेहपुर। आगामी विधानसभा चुनावों की दस्तक के साथ ही जिले की अति-चर्चित और हाई-प्रोफाइल हुसैनगंज (पूर्व में खागा) सीट पर राजनीतिक बिसात तेजी से बिछने लगी है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा), जिसका इस क्षेत्र में ऐतिहासिक रूप से कैडर आधारित मजबूत जनाधार रहा है, इस बार एक ऐसे अप्रत्याशित मास्टरस्ट्रोक की तैयारी में है जिसने विरोधी दलों के थिंक-टैंक की नींद उड़ा दी है। पिछले दो-तीन चुनावों के प्रतिकूल नतीजों से सबक लेते हुए बसपा हाईकमान इस बार पारंपरिक ढर्रे से हटकर एक बेहद मजबूत और सर्वमान्य स्थानीय चेहरे को मैदान में उतारने की गुप्त रणनीति पर काम कर रहा है।
राजनीतिक गलियारों के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, बसपा सुप्रीम लीडरशिप हुसैनगंज सीट से नब्बे के दशक में जिला पंचायत सदस्य रहे, वरिष्ठ पत्रकार एवं फतेहपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष नागेंद्र प्रताप सिंह उर्फ ‘लाला भैया’ के नाम पर गंभीरता से विचार कर रही है। यद्यपि बसपा संगठन अथवा नागेंद्र सिंह के समर्थकों ने रणनीतिक चुप्पी साध रखी है, लेकिन पार्टी के शीर्ष सूत्रों की मानें तो एक विशेष को-ऑर्डिनेटर के जरिए उनका पक्ष सीधे मायावती के समक्ष रखा जा चुका है, जिसके बाद से उनकी सक्रिय राजनीति में वापसी की अटकलें चरम पर हैं।
90 के दशक की अधूरी पटकथा और बदला राजनीतिक चक्र- हुसैनगंज का सियासी इतिहास इस बात का गवाह है कि नब्बे के दशक के मध्य हुए तीसरे विधानसभा चुनाव में बसपा ने नागेंद्र प्रताप सिंह को प्रत्याशी घोषित किया था और स्वयं बसपा सुप्रीमो ने इसका सार्वजनिक ऐलान भी कर दिया था। हालांकि, तत्कालीन बसपा दिग्गज स्वामी प्रसाद मौर्य के हस्तक्षेप और टिकट को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेने के कारण अंततः नागेंद्र सिंह ने सहर्ष अपने कदम पीछे खींच लिए थे। इसके बाद बसपा के टिकट पर चुनाव जीते मुन्ना लाल मौर्य बाद में पाला बदलकर कल्याण सिंह सरकार में मंत्री बने। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी उषा मौर्य लगातार सक्रिय रहीं और वर्तमान में वे समाजवादी पार्टी से इस सीट पर विधायक हैं।
ऐन मौके पर टिकट कटने के बाद नागेंद्र सिंह ने खुद को चुनावी राजनीति से पूरी तरह अलग कर लिया था, लेकिन किसी अन्य दल की सदस्यता न लेकर अपनी मूल अभिरुचि पत्रकारिता पर ही ध्यान केंद्रित रखा, जहां वे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक सशक्त पहचान बनाने में सफल रहे। बाद में उनके बड़े भाई रणवेंद्र प्रताप सिंह (धुन्नी भैया) राजनीति में आए, जो भाजपा के टिकट पर दो बार विधायक चुने गए और पूर्ववर्ती योगी सरकार में राज्य मंत्री रहे। हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव में धुन्नी सिंह 25 हजार से अधिक वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे, जिसके बाद से इस बार भाजपा खेमे में उनका टिकट कटने की चर्चाएं बेहद गर्म हैं।
भाजपा के अगले कदम पर टिकी है बसपा की अंतिम रणनीति- राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि नागेंद्र सिंह की बसपा से औपचारिक प्रत्याशिता का अंतिम फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ‘धुन्नी सिंह’ का टिकट काटती है या नहीं। स्थानीय स्तर पर ‘लाला भैया’ के नाम से लोकप्रिय नागेंद्र सिंह की व्यक्तिगत छवि बेहद स्वच्छ और विवाद-रहित मानी जाती है। अपने क्षेत्र में एकतरफा जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीतने और बाद में ग्राम प्रधानी का चुनाव निर्विरोध जीतने वाले नागेंद्र सिंह की जमीनी पकड़, सर्वसमाज में पैठ और सक्रिय समाज सेवा की ललक आज भी बरकरार है, जिसे बसपा भुनाने के मूड में है।
प्रत्याशी चयन में ‘आंतरिक सर्वे’ और डेटा का सहारा- सूत्रों के अनुसार, बहुजन समाज पार्टी इस बार पारंपरिक सियासी ढर्रे से हटकर प्रत्याशियों के चयन तथा जातीय व क्षेत्रीय समीकरणों को सटीक रूप देने के लिए आंतरिक जनसांख्यिकीय डेटा और बहुस्तरीय ग्राउंड सर्वे का सहारा ले रही है। हुसैनगंज विधानसभा क्षेत्र में कराए गए पार्टी के आंतरिक सर्वे में स्थानीय मतदाताओं के फीडबैक का विस्तृत आकलन किया गया है। इस सर्वे रिपोर्ट में नागेंद्र सिंह की पत्रकारिता पृष्ठभूमि, निष्पक्ष छवि और बौद्धिक पहचान के चलते उनकी जनस्वीकार्यता पार्टी द्वारा तय किए गए मानकों से काफी अधिक पाई गई है।
ग्राउंड रिपोर्ट के जरिए बसपा हाईकमान इस बात का भी सूक्ष्म गणित लगा रहा है कि यदि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी हुसैनगंज से अपना उम्मीदवार बदलती है अथवा मौजूदा चेहरे को ही दोहराती है, तो दोनों ही परिस्थितियों में असंतुष्ट और फ्लोटिंग वोट बैंक का रुख किस ओर होगा। हुसैनगंज के जटिल सवर्ण, पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दलित वोट बैंक के त्रिकोणीय समीकरण में नागेंद्र सिंह की स्वच्छ व सर्वमान्य छवि एक सुरक्षित विकल्प के रूप में उभरकर सामने आ रही है।
जमीनी स्तर पर जनता के मिजाज को भांपने के लिए कराए गए इस गोपनीय सर्वे से यह संकेत भी मिले हैं कि स्थानीय मतदाता अब पारंपरिक और विवादित सियासी चेहरों के बजाय किसी पढ़े-लिखे, सामाजिक रूप से सक्रिय और बेदाग पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को जनप्रतिनिधि के रूप में तरजीह दे रहे हैं। इसी जनाधार और जनभावना के आंकड़ों को आधार बनाकर बसपा हुसैनगंज सीट पर अपनी नई चुनावी बिसात बिछाने की तैयारी में है।
हुसैनगंज विधानसभा सीट पर ‘लाला भैया’ की संभावित प्रत्याशिता न केवल एक तीन दशक पुराने राजनीतिक घटनाक्रम का दिलचस्प मोड़ है, बल्कि उत्तर प्रदेश की पारंपरिक राजनीति का एक अहम पड़ाव भी है। यदि यह कयास आधिकारिक घोषणा में बदलते हैं, तो आगामी चुनाव में हुसैनगंज का मुकाबला प्रदेश के सबसे हाई-प्रोफाइल और दिलचस्प चुनावी संघर्षों में से एक होगा।