घाट पर तांडव चरम पर—प्रशासन की सख्ती बेअसर, जिम्मेदारों की चुप्पी से हालात विस्फोटक
घाट पर तांडव चरम पर—प्रशासन की सख्ती बेअसर, जिम्मेदारों की चुप्पी से हालात विस्फोटक
कालपी में यमुना पर ‘रेत माफियाओं का खुला साम्राज्य’, घाट पर तांडव चरम पर—प्रशासन की सख्ती बेअसर, जिम्मेदारों की चुप्पी से हालात विस्फोटक
दीपक धुरिया अजरा न्यूज़ जालौन कालपी (जालौन) — तरीबुल्दा घाट पर 24 अप्रैल को जो मंजर दिखा, वह सिर्फ अवैध खनन नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था को खुली चुनौती जैसा नजर आया। यमुना की धारा को बेरहमी से चीरती पोकलैंड मशीनें, धूल उड़ाते ओवरलोड ट्रकों की कतारें और दिन-रात चलता खनन—मानो यहां किसी नियम-कानून का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा। सवाल सीधा है—आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है यह ‘रेत साम्राज्य’?
स्थानीय लोगों का कहना है कि तरीबुल्दा घाट से लेकर किलेघाट के सामने यमुना पार, हीरापुर घाट, सिमरा शेखपुर, जीता मऊ और कानपुर देहात सीमा तक करीब 5 किलोमीटर क्षेत्र पूरी तरह खनन माफियाओं के कब्जे में है। हालात ऐसे हैं कि मशीनों से नदी की धारा तक मोड़ी जा रही है, गहराई के नियमों को रौंदा जा रहा है और पर्यावरणीय कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
सबसे चौंकाने वाली तस्वीर हीरापुर घाट से सामने आई है, जहां जल शक्ति विभाग की सुरक्षा दीवार तक को नहीं बख्शा गया। दीवार को तोड़कर खनन का रास्ता बनाया गया और भारी वाहनों की आवाजाही से अब यह संरचना खुद खतरे में है। सवाल उठता है—क्या सरकारी संपत्ति को इस तरह बर्बाद करने की खुली छूट दे दी गई है?
गौरतलब है कि दो साल पहले इसी इलाके में अवैध खनन पर बड़ी कार्रवाई हुई थी, मामला न्यायालय तक पहुंचा था और सख्ती के दावे किए गए थे। लेकिन आज वही हालात पहले से ज्यादा भयावह रूप में सामने हैं। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की कमजोर पकड़ और जिम्मेदार विभागों की निष्क्रियता का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है।
प्रशासन अपनी ओर से जांच टीम गठित होने और निगरानी बढ़ाने की बात जरूर कर रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। खनन का खेल रुकने के बजाय और तेज हो गया है। इससे साफ जाहिर होता है कि कार्रवाई कागजों तक सीमित है, जमीन पर उसका असर न के बराबर है।
यहां सबसे बड़ा सवाल खनन विभाग और संचालन से जुड़े जिम्मेदारों पर खड़ा हो रहा है। आखिर इतनी बड़ी स्तर पर चल रहे इस खेल की भनक इन्हें नहीं है या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं? अगर सब कुछ जानकारी में है, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं? और अगर जानकारी में नहीं है, तो यह और भी गंभीर लापरवाही है।
पर्यावरण की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। यमुना की जलधारा सिकुड़ रही है, जलीय जीवों का अस्तित्व खतरे में है और आसपास के गांवों में प्रदूषण व टूटी सड़कों ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है। किसान खुले तौर पर कह रहे हैं कि खनन ने उनकी सिंचाई व्यवस्था तक हिला दी है।
स्थानीय स्तर पर आक्रोश उबाल पर है। कई जगहों पर खनन को लेकर विवाद और तनाव की स्थिति बन चुकी है, जो कभी भी कानून-व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। हालात अगर ऐसे ही रहे तो स्थिति विस्फोटक होना तय है।
अब वक्त सिर्फ बयानबाजी का नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई का है। अगर जिम्मेदारों पर सख्ती नहीं हुई, तो यह साफ संदेश जाएगा कि माफियाओं के आगे सिस्टम कमजोर पड़ चुका है। जनता अब जवाब चाहती है—और कार्रवाई भी।
यमुना का सीना चीरकर चल रहा यह खेल सिर्फ खनन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से खिलवाड़ है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो इतिहास गवाह रहेगा कि जब नदी मर रही थी, तब जिम्मेदार खामोश थे।