नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा बताते हुए कहा है कि किसी भी मामले की सुनवाई में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि शीघ्र सुनवाई का अधिकार न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें देरी होने से संबंधित पक्षों के अधिकार प्रभावित होते हैं।
शीर्ष अदालत ने हत्या के एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें मामले की सुनवाई स्थगित रखने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने ललितपुर की ट्रायल कोर्ट को हत्या के मामले की सुनवाई जारी रखने और दो महीने के भीतर इसे पूरा करने का निर्देश दिया।
मामले में मृतक के भाई ने सितंबर 2023 में नौ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। पुलिस ने जांच के बाद सात आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद सभी आरोपितों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी ठहराया था।
दरअसल, सात आरोपितों ने जनवरी में ट्रायल कोर्ट में आवेदन देकर हत्या के मामले की कार्यवाही स्थगित करने की मांग की थी। उनका कहना था कि उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत भी मामला चल रहा है और उस मामले की सुनवाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अगस्त में विशेष न्यायाधीश को गैंगस्टर्स एक्ट के तहत दर्ज मामले की सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया था, ताकि अधिनियम की धारा 12 के प्रावधानों का पालन हो सके।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि आरोपितों की दलील स्वीकार कर ली जाती है तो गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 12 संविधान के अनुच्छेद 21 के विपरीत हो जाएगी। इससे आरोपितों को दूसरे मामलों की सुनवाई टालने का आधार मिल सकता है और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि त्वरित सुनवाई का अधिकार केवल आरोपितों तक सीमित नहीं है, बल्कि पीड़ितों को भी शीघ्र न्याय पाने का समान अधिकार है। सुनवाई में अत्यधिक देरी का समाज पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
