अस्पताल बीमार, जनता परेशान, डॉक्टर मजबूर – आखिर जिम्मेदार कौन?
अस्पताल बीमार, जनता परेशान, डॉक्टर मजबूर – आखिर जिम्मेदार कौन?
डॉक्टर के भेष में ‘राक्षस’ या व्यवस्था का शिकार?
अस्पताल बीमार, जनता परेशान, डॉक्टर मजबूर – आखिर जिम्मेदार कौन?
लेखक-राज कुमार अग्रवाल
एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज़– भारत में जब भी किसी अस्पताल में इलाज के दौरान किसी मरीज की मौत होती है, किसी नवजात को समय पर ऑक्सीजन नहीं मिलती, किसी गरीब परिवार को इलाज के लिए जमीन बेचनी पड़ती है या किसी डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप लगता है, तब देशभर में गुस्से की लहर दौड़ जाती है। सोशल मीडिया पर डॉक्टरों को कभी भगवान कहा जाता है तो कभी मौत का सौदागर। लेकिन इस भावनात्मक बहस के बीच एक बड़ा सवाल अक्सर दब जाता है—क्या समस्या केवल डॉक्टरों में है या पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर बीमारी से जूझ रही है?
देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल आज नए नहीं हैं। सरकारी अस्पतालों में लंबी कतारें, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, मशीनों का खराब होना, दवाओं का अभाव, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और निजी अस्पतालों में बढ़ता खर्च वर्षों से चर्चा का विषय रहे हैं। दूसरी ओर डॉक्टरों का पक्ष भी कम गंभीर नहीं है। हजारों चिकित्सक अत्यधिक कार्यभार, मानसिक तनाव, हिंसा के खतरे और संसाधनों की कमी के बीच काम कर रहे हैं।
संसद में दिए गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014 के बाद मेडिकल कॉलेजों की संख्या में बड़ी वृद्धि हुई है। मेडिकल कॉलेज 387 से बढ़कर 731 तक पहुंच गए हैं, जबकि एमबीबीएस सीटें दोगुने से अधिक बढ़ी हैं। सरकार का दावा है कि इससे डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार होगा।
फिर भी सवाल बना हुआ है कि यदि डॉक्टरों की संख्या बढ़ रही है तो सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी की शिकायतें क्यों हैं? यदि देश में लाखों डॉक्टर पंजीकृत हैं तो ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ चिकित्सक क्यों नहीं पहुंच पा रहे? क्या समस्या संख्या की है या वितरण की?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि भारत में चुनौती केवल डॉक्टरों की संख्या नहीं बल्कि स्वास्थ्य ढांचे की असमानता है। बड़े शहरों में आधुनिक अस्पताल और विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद हैं, जबकि दूरदराज के इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पर्याप्त संसाधनों के बिना काम कर रहे हैं। इस असंतुलन का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ता है।
इसी बीच एक और बहस लगातार उठती रही है—इलाज इतना महंगा क्यों हो गया? निजी अस्पतालों में बढ़ते पैकेज, महंगे उपकरण, बढ़ती बीमा आधारित चिकित्सा व्यवस्था और दवाओं पर होने वाला खर्च आम परिवारों की आर्थिक क्षमता को चुनौती दे रहा है। आर्थिक अध्ययनों के अनुसार भारत में स्वास्थ्य खर्च का बड़ा हिस्सा अब भी लोगों को अपनी जेब से वहन करना पड़ता है, हालांकि पिछले दशक में इसमें कुछ कमी दर्ज की गई है।
मेडिकल शिक्षा भी एक बड़ा प्रश्न है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें सीमित हैं जबकि निजी संस्थानों में पढ़ाई का खर्च लाखों से लेकर करोड़ों रुपये तक पहुंच जाता है। आलोचकों का तर्क है कि महंगी चिकित्सा शिक्षा अंततः स्वास्थ्य सेवाओं की लागत को प्रभावित करती है। वहीं समर्थकों का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा शिक्षा और अस्पतालों की स्थापना स्वयं अत्यधिक खर्चीली प्रक्रिया है। एक महत्वपूर्ण प्रश्न राजनीतिक जवाबदेही का भी है। जब किसी अस्पताल में गंभीर प्रशासनिक विफलता सामने आती है, तब अक्सर डॉक्टरों और निचले कर्मचारियों पर कार्रवाई होती दिखाई देती है। लेकिन क्या स्वास्थ्य नीतियों, बजट आवंटन, भर्ती प्रक्रिया और अस्पताल प्रबंधन की विफलताओं के लिए शीर्ष स्तर पर भी जवाबदेही तय होती है? यही प्रश्न आम नागरिकों के मन में लगातार उठता रहा है। इस बहस का दूसरा पक्ष डॉक्टरों की स्थिति है। अनेक चिकित्सक बताते हैं कि उन्हें कभी-कभी एक दिन में सैकड़ों मरीज देखने पड़ते हैं। कई सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की संख्या आवश्यकता से कम है। हाल के वर्षों में डॉक्टर संगठनों ने वेतन, कार्य परिस्थितियों और सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है। ऐसे में यह बहस केवल डॉक्टर बनाम मरीज की नहीं रह जाती। यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की बहस बन जाती है। इसमें सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय, अस्पताल प्रशासन, मेडिकल शिक्षा प्रणाली, दवा उद्योग, बीमा कंपनियां, डॉक्टर और नागरिक—सभी की भूमिका शामिल है।
सवाल यह नहीं है कि डॉक्टर भगवान हैं या राक्षस। असली सवाल यह है कि क्या भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था अपने नागरिकों को वह सम्मानजनक और सुलभ इलाज दे पा रही है जिसकी अपेक्षा एक लोकतांत्रिक राष्ट्र से की जाती है?
जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं खोजा जाएगा, तब तक जनता परेशान रहेगी, डॉक्टर दबाव में रहेंगे और अस्पतालों की व्यवस्था लगातार कटघरे में खड़ी रहेगी।