भारत माता’ की जय-जयकार, राजनीतिक हथियार या संविधान की कसौटी ?
भारत माता’ की जय-जयकार, राजनीतिक हथियार या संविधान की कसौटी ?
भारत माता’ की जय-जयकार, राजनीतिक हथियार या संविधान की कसौटी?
लेखक: राजकुमार अग्रवाल सुर्खियों में क्यों है ‘भारत माता’ का नारा?
एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज़ — आजकल देश की राजनीति और दूरदर्शन प्रणालियों पर ‘भारत माता की जय’ का नारा सबसे बड़ी बहस का मुद्दा बना हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में हमारे समाज में एक नया चलन देखा गया है।
आज स्थिति यह बन चुकी है कि यदि कोई व्यक्ति इस नारे को लगाने से मना कर देता है या चुप रहता है, तो उसे तुरंत ‘देशद्रोही’ या ‘राष्ट्र-विरोधी’ कह दिया जाता है। दूरदर्शन पर होने वाली तीखी बहसों से लेकर सड़कों पर होने वाले प्रदर्शनों तक, यह मुद्दा लोगों को आपस में बांट रहा है।
लेकिन एक सजग पत्रकार और आम नागरिक के नाते यह सोचना जरूरी है कि क्या वास्तव में ‘भारत माता की जय’ बोलना ही देशभक्ति का एकमात्र पैमाना है? क्या हमारा कानून या देश का पवित्र संविधान भी किसी नागरिक को ऐसा करने के लिए मजबूर करता है? या फिर यह राष्ट्रवाद के नाम पर खेला जाने वाला एक राजनीतिक खेल है?
भारत माता आख़िर कौन हैं और यह विचार कहाँ से आया? यदि हम भारत के प्राचीन इतिहास, वेदों या धार्मिक ग्रंथों को देखें, तो ‘भारत माता’ नाम की किसी देवी का कोई सीधा उल्लेख नहीं मिलता। हाँ, ऋग्वेद और अथर्ववेद के ‘भूमि सूक्त’ में धरती और मातृभूमि को मां का दर्जा जरूर दिया गया है, जहाँ कहा गया है— “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” (अर्थात: धरती मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूँ)। लेकिन एक देवी के रूप में ‘भारत माता’ का विचार आंग्ल शासन की पराधीनता के समय 19 वीं सदी के आखिरी वर्षों में उत्पन्न हुआ था।
इस विचार की शुरुआत 1873 में किरन चंद्र बनर्जी के एक बंगाली नाटक ‘भारत माता’ से हुई थी। इसके बाद, 1882 में बंकिम चंद्र चटर्जी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ के ‘वन्दे मातरम्’ गीत ने इस भावना को लोगों के दिलों तक पहुँचाया। वर्ष 1905 में बंग-भंग (बंगाल विभाजन) के विरोध के दौरान, मशहूर कलाकार अवनींद्रनाथ टैगोर (रवींद्रनाथ टैगोर के भतीजे) ने ‘भारत माता’ का पहला चित्र बनाया।
इस मूल चित्र में भारत माता को चार हाथों वाली एक शांत संन्यासिनी के रूप में दिखाया गया था, जिनके हाथों में पुस्तक, माला, सफेद वस्त्र और धान की बालियां थीं—जो शिक्षा, आध्यात्म, वस्त्र और भोजन का प्रतीक थीं।
इस शुरुआती रूप में न तो कोई सिंह था और न ही कोई त्रिशूल। लेकिन बाद के वर्षों में, विशेषकर विनायक दामोदर सावरकर के हिंदुत्व के सिद्धांतों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव के कारण, भारत माता के रूप को बदल दिया गया। उन्हें एक सिंह पर बैठी, हाथ में भगवा ध्वज लिए और अखंड भारत के मानचित्र के सामने खड़ी एक शक्तिशाली देवी के रूप में दिखाया जाने लगा।
दुनिया के देश और भारत के 11 नाम: क्या 11 माताएं होनी चाहिए? एक बड़ा सीधा और तार्किक सवाल अक्सर उठाया जाता है कि दुनिया के लगभग २०४ देशों में से किसी भी देश में ऐसी कोई ‘मां’ या ‘पिता’ की शासकीय या धार्मिक धारणा नहीं है। कुछ देशों में ‘मातृभूमि रूस’ या ‘पितृभूमि’ (जर्मनी) जैसे शब्द केवल कविताओं या भाषणों में इस्तेमाल होते हैं, लेकिन भारत की तरह वहां इस पर कोई लड़ाई-झगड़ा या कानूनी बाध्यता नहीं थोपी जाती।
इसके अलावा, यदि हम इतिहास को देखें, तो भारत के प्राचीन काल से लेकर अब तक कुल ११ ऐतिहासिक नाम मिलते हैं। अगर तर्क के आधार पर देखें, तो क्या नाम ११ होने से हमारी ११ माताएं होनी चाहिए? आइए पहले इन ११ नामों को बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं:
भारतवर्ष: ऋग्वेद के प्रतापी ‘भरत’ कबीले और राजा दुष्यंत-शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर।
भारत: ‘भा’ (यानी ज्ञान) और ‘रत’ (यानी लगा हुआ)—वह भूमि जो ज्ञान की खोज में लगी रहती है।
इंडिया: सिंधु नदी के नाम पर यूनानियों और बाद में आंग्ल शासकों द्वारा दिया गया नाम।
हिंदुस्तान: प्राचीन पारस (ईरान) के लोगों द्वारा ‘सिंधु’ नदी के पार रहने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया गया नाम।
आर्यावर्त: प्राचीन काल में उत्तर भारत में रहने वाले आर्यों के कारण पड़ा नाम।
जम्बूद्वीप: पुराने समय के भूगोल के अनुसार, उस इलाके का नाम जहाँ जामुन के वृक्ष बहुत होते थे।
अजनाभवर्ष: पुरानी कथाओं के अनुसार, राजा नाभिराज के साम्राज्य के नाम पर।
नाभिवर्ष: राजा नाभि के शासन क्षेत्र के कारण।
ब्रह्मवर्त: प्राचीन काल में सरस्वती और दृशद्वती नदियों के बीच का पवित्र क्षेत्र।
हिन्द: अरब के इतिहासकारों और यात्रियों द्वारा भारत के लिए इस्तेमाल किया गया छोटा नाम।
प्राचीन चीनी यात्रियों (जैसे ह्वेनसांग) द्वारा भारत को दिया गया नाम, जिसका अर्थ ‘पवित्र भूमि’ होता है।