सभ्यता व मानवता ही आज की आवश्यकता : दार्शनिक सूर्य जी
सभ्यता व मानवता ही आज की आवश्यकता : दार्शनिक सूर्य जी
सभ्यता व मानवता ही आज की आवश्यकता : दार्शनिक सूर्य जी
एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज–सभ्य और असभ्य में अंतर यही है कि सभ्य लोग संस्कारवान होते हैं, वे गाली-गलौज नहीं करते, अपशब्द नहीं बोलते और सभी का सम्मान करते हैं। पर आज हमारी सभ्यता और संस्कृति को कितने लोग सच में अपना रहे हैं, यह विचारणीय है। हमारा देश संस्कृति, सभ्यता, एकता और सद्भावना जैसे सद्गुणों पर आधारित है, फिर भी हर व्यक्ति मानवीय नहीं हो पाता। हमारा प्रयास यही होना चाहिए कि हम स्वयं मानवीय बनें और दूसरों को भी बनाएं। आज प्रेमचंद की बात सत्य प्रतीत होती है, समाज में अन्याय बढ़ा है और लोग कठोर होते जा रहे हैं। व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार ही कर्म करता है, हम कितना भी सुधारने का प्रयत्न कर लें, सभी में विवेक नहीं होता। इसलिए मानवता ही हमारा सर्वोपरि धर्म है। हमें दयालुतापूर्ण जीवन जीना चाहिए, जिसका अर्थ है सभी के प्रति संवेदना रखना, यथासंभव सहायता करना, मानसिक तनाव से ग्रस्त लोगों को सहारा देना और समाज में सकारात्मकता फैलाना। हमें यह ध्यान रखना होगा कि दूसरों को प्रेरित करने के अतिरिक्त, स्वयं भी उन मूल्यों को अपनाकर सहज रहना है। समाज में जागरूकता और संवेदनशीलता तभी बनी रहेगी जब इंसान इंसान से भाईचारा रखेगा। सेवा के लिए जब कोई पुकारे तो उसके लिए खड़ा होना होगा, तभी मानवों में संवेदना जागृत रहेगी। भारतीय दार्शनिक सूर्य: संस्कृति के संरक्षक, समरसता के प्रतीक, आध्यात्मिक चिंतक, महनीय साहित्यकार एवं मानवतावादी समाज-सुधारक