गुरु का ऋण जीवनभर नहीं चुका सकता शिक्षा और संस्कारों का ऋणी हूँ – धीर सिंह यादव
गुरु का ऋण जीवनभर नहीं चुका सकता शिक्षा और संस्कारों का ऋणी हूँ – धीर सिंह यादव
गुरु का ऋण जीवनभर नहीं चुका सकता – धीर सिंह यादव
आदरणीय गुरु सुरेश सिंह की शिक्षा और संस्कारों का ऋणी हूँ : धीर सिंह यादव
एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज फतेहपुर। गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का वह पावन पर्व है, जो गुरु और शिष्य के अटूट, पवित्र एवं आदर्श संबंध का प्रतीक है। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि उन महान गुरुजनों के प्रति अपनी श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जिनके ज्ञान, संस्कार और मार्गदर्शन से जीवन को सही दिशा मिलती है। इसी अवसर पर पत्रकार धीर सिंह यादव ने अपने आदरणीय गुरु एवं पंडित चन्द्रिका प्रसाद इंटर कॉलेज हुसैनगंज (पी.सी.पी) के सम्मानित शिक्षक सुरेश सिंह ‘गुरु जी’ के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की है। धीर सिंह यादव ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सबसे प्रथम गुरु उसके माता-पिता होते हैं। वही हमें बोलना, चलना, संस्कारों का महत्व और जीवन के मूल सिद्धांत सिखाते हैं। लेकिन जब एक बालक शिक्षा के लिए विद्यालय की चौखट पर कदम रखता है, तब उसके व्यक्तित्व, विचार और भविष्य का निर्माण उसके शिक्षक करते हैं। शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस, अनुशासन, नैतिकता और सही निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि उनके जीवन में आदरणीय सुरेश सिंह ‘गुरु जी’ का स्थान अत्यंत विशेष और प्रेरणादायी रहा है। विद्यालय के दिनों में उन्होंने जो शिक्षा, संस्कार और अनुशासन दिया, वही आज भी उनके जीवन का मार्गदर्शन कर रहा है। गुरु जी की सीख, उनका स्नेह, उनका विश्वास और समय-समय पर मिली उनकी डांट ने उन्हें निरंतर बेहतर बनने की प्रेरणा दी। आज वे जिस स्थान पर हैं, उसमें उनके गुरु का अमूल्य योगदान है।
धीर सिंह यादव ने भावुक शब्दों में कहा, “जीवन में कई लोग मिलते हैं, लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो हमेशा के लिए हमारी सोच और जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। मेरे लिए आदरणीय सुरेश सिंह गुरु जी ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। उन्होंने मुझे केवल पढ़ाया ही नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान बनने की सीख भी दी। उनकी डांट में भी अपनापन था, उनकी हर सीख में भविष्य की चिंता और हर शब्द में स्नेह छिपा होता था। आज यदि मैं अपने जीवन में कुछ भी हासिल कर पाया हूँ, तो उसमें मेरे गुरु जी के मार्गदर्शन, आशीर्वाद और प्रेरणा की महत्वपूर्ण भूमिका है।”
उन्होंने आगे कहा कि गुरु का ऋण किसी भी प्रकार से चुकाया नहीं जा सकता। गुरु का आशीर्वाद ही शिष्य की सबसे बड़ी पूंजी होता है, जो जीवनभर उसका मार्ग प्रशस्त करता है। गुरु के द्वारा दिए गए संस्कार और मूल्य ही व्यक्ति को समाज में सम्मान दिलाते हैं तथा हर कठिन परिस्थिति में सही राह दिखाते हैं।
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर धीर सिंह यादव ने अपने आदरणीय गुरु सुरेश सिंह ‘गुरु जी’ सहित सभी गुरुजनों को सादर नमन करते हुए उनके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं सुखमय जीवन की कामना की। उन्होंने कहा कि गुरु का सम्मान करना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की वह महान विरासत है, जिसे प्रत्येक शिष्य को जीवनभर निभाना चाहिए। गुरु का स्नेह, आशीर्वाद और मार्गदर्शन ही वह प्रकाश है, जो जीवन के हर अंधकार को दूर कर सफलता और सदाचार की राह दिखाता है।