नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना स्थित POCSO कोर्ट में तैनात अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अशोक भरतेंदु को न्यायिक जिम्मेदारियों से हटाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की है। न्यायिक अधिकारी के खिलाफ दिल्ली में दुष्कर्म का मामला लंबित है। शिकायतकर्ता महिला ने इसी आधार पर उन्हें POCSO कोर्ट की जिम्मेदारी से अलग करने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन से जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ लंबित सतर्कता जांच की स्थिति का पता लगाया जाना जरूरी है। अदालत ने संकेत दिया कि जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए हाईकोर्ट से आवश्यक कदम उठाने को कहा जा सकता है।
2022 में दर्ज हुई थी एफआईआर
मामले के अनुसार, महिला की शिकायत पर 8 दिसंबर 2022 को दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 थाने में अशोक भरतेंदु के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। शिकायत में शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया गया है।
न्यायिक अधिकारी ने एफआईआर को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। मार्च 2023 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण दिया था। हालांकि, बाद में अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कार्यवाही पर कोई रोक नहीं है और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
पुलिस की ओर से आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बाद दिल्ली की संबंधित अदालत ने मामले में संज्ञान लिया। आरोपों की सत्यता का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत होना है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी दाखिल की गई थी याचिका
शिकायतकर्ता महिला ने न्यायिक अधिकारी के POCSO कोर्ट में कार्य करते रहने को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। महिला ने मांग की थी कि दुष्कर्म के मामले में आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे अधिकारी को बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई की जिम्मेदारी से अलग किया जाए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 अगस्त 2026 को महिला की याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि न्यायिक अधिकारी के कामकाज से संबंधित ऐसा कोई ठोस आधार रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके आधार पर उन्हें न्यायिक जिम्मेदारियों से हटाने का आदेश दिया जा सके। इसके बाद शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सतर्कता जांच की प्रगति पर भी उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता के वकील राकेश कुमार सिंह ने दलील दी कि न्यायिक अधिकारी के खिलाफ दुष्कर्म का मामला लंबित होने के बावजूद उनका POCSO कोर्ट में बने रहना गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि अधिकारी को निलंबित करने के बजाय कम से कम संवेदनशील न्यायिक जिम्मेदारी से अलग किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारी को न्यायिक कार्य से हटाने का प्रशासनिक निर्णय हाईकोर्ट को लेना चाहिए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि सतर्कता जांच किस चरण में है, इसकी जानकारी उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।
11 दिसंबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन से जवाब मांगा है। अदालत ने संकेत दिया कि लंबित सतर्कता जांच को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।
मामले की अगली सुनवाई 11 दिसंबर 2026 को निर्धारित की गई है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी को POCSO कोर्ट से हटाने का कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। दुष्कर्म से संबंधित आरोप अभी न्यायिक विचाराधीन हैं और दोषसिद्धि होने तक आरोपी को कानून के अनुसार निर्दोष माना जाता है।
