समिति गठन के नाम पर लाखों की खुली डील, वसूली बाबू के सिंडिकेट का जाल

    सहकारिता की साख पर घूसखोरी का दीमक: फतेहपुर में समिति गठन के नाम पर लाखों की खुली डील
 वसूली बाबू के सिंडिकेट ने बिछाया भ्रष्टाचार का जाल, शासन में हड़कंप, 18 जून को लखनऊ से आ रहे अपर आयुक्त
 

एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज़ फतेहपुर। उत्तर प्रदेश का सहकारिता विभाग एक बार फिर आकंठ भ्रष्टाचार के दलदल में घिरता नजर आ रहा है। इस बार भ्रष्टाचार का यह जिन्न जनपद फतेहपुर से निकला है, जहां सहकारिता के मूल सिद्धांतों और सरकारी नियमों को ताक पर रखकर नई समितियों के गठन में लाखों रुपये के वारे-न्यारे किए गए हैं। जिला सहकारी बैंक लिमिटेड, फतेहपुर के सभापति व भारतीय जनता पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष प्रभुदत्त दीक्षित द्वारा सीधे सहकारिता मंत्री को भेजे गए पत्र ने विभाग के भीतर चल रहे संगठित भ्रष्टाचार की कलई खोलकर रख दी है। इस सनसनीखेज शिकायत के बाद शासन स्तर पर हड़कंप मच गया है, जिसके चलते लखनऊ से अपर आयुक्त एवं अपर निबंधक (सहकारिता) अशोक कुमार आगामी 18 जून को स्वयं फतेहपुर पहुंचकर इस पूरे घालमेल की मौके पर ही जांच करने आ रहे हैं।
बाबूराज के आगे बौना हुआ तंत्र, प्रति समिति 3.50 लाख की रिश्वत: शिकायती पत्र के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, सहायक आयुक्त एवं सहायक निबंधक कार्यालय फतेहपुर में तैनात एक वसूली बाबू अनिल कुमार वर्मा ने पूरे कार्यालय को अपनी जागीर बना लिया है। आरोप है कि यह बाबू जनपद के चुनिंदा रसूखदारों को चिन्हित करता है और उनसे नई समिति के गठन के एवज में 3.00 लाख से 3.50 लाख रुपये तक की खुली धन उगाही कर रहा है। ल विभागीय सूत्रों की मानें तो यह वसूली अकेले एक बाबू के बस की बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे ऊपर से नीचे तक एक पूरा गिरोह काम कर रहा है, जो बिना सुविधा शुल्क के किसी भी फाइल को आगे बढ़ने नहीं देता। सभापति ने इस बाबू के रसूख और आतंक को देखते हुए उसे तत्काल जनपद से स्थानांतरित कर पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की थी।
बड़ा खुलासा: उच्च न्यायालय से स्टे खारिज होने के बाद भी 27 वर्षों से जमा है प्रभारी सचिव : फतेहपुर सहकारिता विभाग में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विभाग में ऐसे ‘सफेदहाथी’ भी पाल रखे हैं जो सीधे कानून को चुनौती दे रहे हैं। विभागीय साठगांठ का एक ऐसा ही हैरतअंगेज मामला भी चर्चा में है, जहां एक प्रभारी सचिव उच्च न्यायालय द्वारा ‘स्टे ऑर्डर’ (स्थगन आदेश) खारिज किए जाने के बाद भी पिछले 27 वर्षों से सीना ताने अपनी नौकरी पर जमा हुआ है। नियमों के मुताबिक स्टे खारिज होते ही सेवा समाप्ति या उचित विधिक कार्रवाई होनी चाहिए थी, लेकिन रसूख और अंदरूनी सांठगांठ के दम पर इस प्रभारी सचिव की कुर्सी को आज तक कोई हिला नहीं सका। ऐसे दागी चेहरों को मलाईदार पदों पर बनाए रखना यह साफ करता है कि ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार का तंत्र किस कदर मजबूत है।
बिना रीढ़ की नवगठित समितियां, गबन की बड़ी तैयारी! : इस पूरे खेल में केवल पैसे का ही लेन-देन नहीं हुआ, बल्कि समितियों को पूरी तरह अपाहिज बना दिया गया है। नियमों को ताक पर रखकर बिना नियमित सचिवों के ही समितियों का ढांचा खड़ा कर दिया गया है। मात्र प्रस्तावक सचिवों के भरोसे अरबों रुपये के कारोबार वाले इस सहकारिता तंत्र को झोंक दिया गया है, जिससे आने वाले दिनों में करोड़ों रुपये के सहकारी गबन की पूरी पटकथा तैयार दिख रही है। इसके अलावा, डिजिटल होते इस दौर में इन समितियों में कंप्यूटर संचालक की नियुक्तियां भी ठप पड़ी हैं। फतेहपुर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी की रिपोर्ट के मुताबिक, जनपद की 72 नवगठित समितियों में से महज 06 समितियों को ही कंप्यूटर संचालक नसीब हो पाए हैं, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि विभाग पारदर्शिता से कितना डरता है।
कागजों पर दौड़ीं समितियां, धरातल पर किसान बेहाल : सहकारिता विभाग की कार्यशैली का सबसे क्रूर चेहरा किसानों से जुड़े आंकड़ों में दिखता है। जनपद में नई समिति गठन का लक्ष्य 98 निर्धारित था, जिसके सापेक्ष 72 समितियां आनन-फानन में कागजों पर खड़ी तो कर दी गईं, लेकिन उन्हें कार्यक्षेत्र का आवंटन तक नहीं किया गया है। पुरानी समितियों के सचिवों पर नई समितियों का अतिरिक्त बोझ लाद दिया गया, जिसके कारण कई सचिवों ने प्रभार लेने से ही हाथ खड़े कर दिए हैं। नतीजा यह है कि वर्तमान में उर्वरक (खाद) और ऋण सीमा (किसान क्रेडिट कार्ड) की पत्रावलियों पर हस्ताक्षर करने वाला कोई नहीं है। किसान बुवाई के सीजन में खाद और ऋण के लिए दर-दर भटक रहा है और विभाग घूसखोरी की मलाई काटने में व्यस्त है।
सदस्यता महाअभियान का ढोंग, हजारों किसानों की पासबुक डंप : विभाग के भीतर व्याप्त अकर्मण्यता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सदस्यता महाअभियान के तहत जिन गरीब किसानों को सहकारिता से जोड़ने का ढोल पीटा गया था, उन्हें भी विभाग ने ठग लिया। आंकड़ों के अनुसार, कुल 38,000 कृषक पंजिकाएं प्राप्त हुई थीं, जिनमें से केवल 29,396 किसानों को ही पासबुक मिल सकी है। शेष 8,604 किसानों की पासबुक विभागीय दफ्तरों की अलमारियों में धूल फांक रही हैं। बिना पासबुक के ये किसान न तो लोन ले सकते हैं और न ही सरकारी योजनाओं का लाभ उठा पा रहे हैं।
18 जून को महामंथन, क्या नपेंगे बड़े अफसर? : सहकारिता विभाग के इस संगठित भ्रष्टाचार की गूंज जब लखनऊ के गलियारों में पहुंची, तो शीर्ष अफसरों के भी हाथ-पांव फूल गए। अपर आयुक्त एवं अपर निबंधक अशोक कुमार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए 18 जून, 2026 को सुबह 10:00 बजे जिला सहकारी बैंक फतेहपुर में खुली जांच लगाने का आदेश जारी किया है। इस जांच में शिकायतकर्ता सभापति, सहायक आयुक्त सहकारिता, बैंक के मुख्य कार्यपालक अधिकारी सहित सभी पक्षों को मूल दस्तावेजों के साथ तलब किया गया है।
अब देखना यह होगा कि क्या लखनऊ से आ रही जांच टीम इस वसूली गिरोह की जड़ों पर प्रहार करती है या फिर हमेशा की तरह किसी छोटे मोहरे की बलि देकर इस महाभ्रष्टाचार की फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। पूरे जनपद और सहकारिता जगत की निगाहें अब 18 जून की इस महाजांच पर टिकी हैं।

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