NASA का 1.5 टन वजनी टेलीस्कोप आज पृथ्वी के वायुमंडल में करेगा प्रवेश, भारत के कई शहर संभावित मलबा क्षेत्र में

नई दिल्ली। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA का करीब 1.5 टन वजनी अंतरिक्ष टेलीस्कोप Neil Gehrels Swift Observatory लगभग 22 साल बाद पृथ्वी के वायुमंडल में वापस प्रवेश करने जा रहा है। 20 नवंबर 2004 को लॉन्च किए गए इस अंतरिक्ष यान के 4 नवंबर 2026 को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने का अनुमान है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, वायुमंडल में प्रवेश के दौरान इसका अधिकांश हिस्सा तेज गर्मी के कारण जलकर नष्ट हो जाएगा, लेकिन कुछ भारी उपकरणों के टुकड़े धरती तक पहुंच सकते हैं।

दक्षिण भारत के कई शहर संभावित दायरे में

NASA के अनुमान के अनुसार, अंतरिक्ष यान के पृथ्वी पर लौटने का संभावित क्षेत्र 20.6 डिग्री उत्तरी अक्षांश से 20.6 डिग्री दक्षिणी अक्षांश के बीच है। इस विस्तृत क्षेत्र में भारत के कुछ हिस्सों के अलावा अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मध्य और दक्षिण अमेरिका के इलाके भी शामिल हैं।

भारत में मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, भुवनेश्वर और कोच्चि जैसे शहर इस संभावित अक्षांशीय क्षेत्र में आते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इन शहरों में मलबा गिरना तय है। वास्तविक स्थान का पता टेलीस्कोप के वायुमंडल में प्रवेश करने के समय ही चल सकेगा।

14 घंटे के आसपास हो सकता है समय में अंतर

अमेरिकी स्पेस फोर्स के अनुमान के अनुसार, अंतरिक्ष यान 4 नवंबर को अमेरिकी समयानुसार सुबह लगभग 3:30 बजे पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर सकता है। NASA ने इस अनुमान में करीब 11 घंटे की अनिश्चितता बताई है। भारतीय समय के अनुसार यह लगभग दोपहर 2 बजे का समय बनता है।

22 साल तक अंतरिक्ष में करता रहा काम

Neil Gehrels Swift Observatory को शुरुआत में केवल दो साल के वैज्ञानिक मिशन के लिए तैयार किया गया था, लेकिन इसने करीब 22 वर्षों तक अंतरिक्ष में काम किया। इसका मुख्य उद्देश्य ब्रह्मांड में होने वाले शक्तिशाली विस्फोटों यानी गामा-रे बर्स्ट का अध्ययन करना था।

इस अंतरिक्ष वेधशाला में तीन अलग-अलग टेलीस्कोप लगाए गए थे, जिनकी मदद से ब्रह्मांड की विभिन्न घटनाओं का अध्ययन किया जाता था। अपने लंबे वैज्ञानिक अभियान के दौरान इसने 2,000 से अधिक गामा-रे बर्स्ट और 1,400 से ज्यादा सुपरनोवा से संबंधित घटनाओं का अध्ययन किया।

समुद्र में गिरने की संभावना अधिक

वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय अंतरिक्ष यान का अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट हो जाएगा। कुछ भारी धातु से बने उपकरण और टेलीस्कोप के हिस्से बच सकते हैं। हालांकि, पृथ्वी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा समुद्र से घिरा होने के कारण बचे हुए मलबे के समुद्र में गिरने की संभावना अधिक मानी जा रही है।

विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि संभावित क्षेत्र में किसी शहर का शामिल होना वहां मलबा गिरने की निश्चित चेतावनी नहीं है। फिलहाल NASA और अमेरिकी अंतरिक्ष बल इसकी पृथ्वी पर वापसी की निगरानी कर रहे हैं।

अंतरिक्ष मलबे की निगरानी करता है ISRO

भारत में भी अंतरिक्ष से वापस आने वाली वस्तुओं की निगरानी के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के पास आधुनिक रडार प्रणाली मौजूद है। श्रीहरिकोटा में स्थापित मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार (MOTR) अंतरिक्ष में मौजूद विभिन्न वस्तुओं की गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम है।

हालांकि, इस विशेष टेलीस्कोप की निगरानी को लेकर ISRO की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *