२०२७ विधान सभा चुनाव में यू पी बंटवारा और चुनाव की विश्वसनीयता एक चुनौती
२०२७ विधान सभा चुनाव में यू पी बंटवारा और चुनाव की विश्वसनीयता एक चुनौती
२०२७ विधान सभा चुनाव में यू पी बंटवारा और चुनाव की विश्वसनीयता एक चुनौती
_असंगठित कामगार और कर्मचारी कांग्रेस एम ज़र्रेयाब खान अज़रा न्यूज — आज अखिल भारतीय असंगठित कामगार कांग्रेस के कोआर्डिनेटर मिस्बाहुल हक़ ने यूपी बटवारा और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हुए सोशल मीडिया पर रूबरू होते हुए कहा कि अभी बीते दिनों ओमप्रकाश राजभर कैबिनेट मंत्री ने उत्तर प्रदेश को चार हिस्सो में बांटकर क्षेत्रीय आकांक्षाओं और स्वयं के प्रतिनिधित्व को उभारकर बहस को सामने ला दिया है। इसे एनडीए के राजनीतिक हितों की संभावना पर देखना चाहिए आखिर बीजेपी समर्थित क्षे़त्रीय दलों की सोंच और विचारधारा वही होती है जो समाज को बांटकर सत्ता प्राप्त करने वाली होती है। कुछ ऐसी ही भाषा अपना दल की अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद भी देते रहे हैं। क्षेत्रीय दलों के गठन से प्राप्त सत्ता में अतिपिछड़ी जातियों के राजनीति एवं सामाजिक अधिकार और आर्थिक विकास, धार्मिक वर्चस्व की राजनीति के अन्दर क्यों समा गया जिससे उन समुदायों की सामाजिक आर्थिक स्थिति उस सीमा तक नहीं पहुंची जहां मण्डल कमीशन की रिपोर्ट ने उनको लक्षित किया था ।आज अधिक संख्या में ओबीसी प्रतिनिधित्व या अल्पसंख्यक विधायक/सांसद या त्रिस्तरीय चुनाव में मिली संख्या क्या उनकी सामाजिक, आर्थिक उपलब्धियां सार्वजनिक/निजी संस्थाओं में भागीदारी का न्याय मिला है ,?आज जब जगनायक राहुल गांधी, जातीय जनगणना,सामाजिक न्याय एवं भागीदारी की बात करते हैं तो यह दल अपने स्वजातीय हितों के लिए एनडीए घटक दलों के नेता सामाजिक न्याय के मुद्दे पर खामोश क्यों रहते हैं। देखना होगा। राजनीतिक हितों को साधने के लिए जनता की भागीदारी लोकतांत्रिक ढंग से एक संस्थागत प्रक्रिया से बंधी हुई है। जिसको संविधान ने भाषा दी है।
ऐसे समय में दो मुद्दो की एक कसौटी है कि यूपी को बांटकर और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को समाप्त कर जो पहल की जा रही है वह देश में ही नहीं बल्कि संविधान विरुद्ध है, और जनमानस समझ चुका है,इसीलिए जननायक राहुल गांधी जी ने दो दिन पूर्व पूरे देश में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करते हुए इंडियन एक्सप्रेस की खबर को तौला है और पाया है कि मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया में किस प्रकार सत्ता को लाभ पहुंचाने के लिए संवैधानिक शक्ति को तार-तार किया है। यहां तक की चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी के 10 महीनों में कम से कम 14 लिखित आपत्तियों को दर्ज करने के बाद भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बहुमत के निर्णय को नकारा। रिपोर्ट के अनुसार आपत्तियों को ,मतदाता पंजीकरण नाम हटाने, पुर्नस्थपित करने, डाटा प्रबन्धन में गोवा में 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया। जिनके सम्बन्ध में स्थानीय चुनाव पंजीकरण अधिकारी ने उन्हें पात्र पाया। लेकिन सॉफ्टवेयर सम्बन्धित प्रक्रिया के कारण उनके नाम पुनः दर्ज करने में कठिनाई आई। इस सम्बन्ध में संस्थागत सम्वाद, मतभेद, निर्णय प्रक्रिया, जनता के सामने रखा जाना चाहिए था। ऐसे प्रकरण में देश के विभिन्न राज्यों में स्थापित उच्च न्यायालय/ सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय लोकतांत्रिक अधिकार में एक वोट की वैल्यू को संवैधानिक न्याय वैल्यू नहीं दे पा रहे हैं। इससे साबित होता है कि जातीय ध्रुवीकरण और चुनावी व्यवस्था में राजनैतिक लाभ के लिए जनता के हित को यह दल समाप्त कर रहे हैं।
आज जनता टीएन शेषन की विरासत को याद करती है जिसमें चुनाव आयोग पूरे देश में पात्र मतदाता के अधिकार को पारदर्शी प्रक्रिया के तहत एक संस्थागत नियम बनाया। ऐसे व्यक्तित्व की समय को तालाश है जो निश्चित ही देश को संवैधानिक न्याय देगा।